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दुधवा की गैंडा पुनर्वास योजना फेज वन में विचरण करता गैंडा। (फाइल फोटो) - फोटो : Lakhimpur Kheri |
बांकेगंज (लखीमपुर खीरी)। दुधवा नेशनल पार्क में 37 साल पहले शुरू हुई गैंडा पुनर्वासन योजना तमाम हिचकोले खाने के बावजूद काफी सफल रही। 2018 में गैंडा पुनर्वासन योजना फेज टू शुरू होने के बाद आनुवंशिक बदलाव संभव हो पाया है। इससे गैंडा परिवार के और अधिक फलने-फूलने की संभावना बढ़ गई है। गैंडों की शुरुआत संख्या चार से अब 44 तक का सफर काफी रोमांचक रहा है।
किसी जगह से लुप्त प्राणी को उसके पूर्वजों की धरती पर फिर से बसाने का अभिनव प्रयोग दुधवा नेशलन पार्क में गैंडा पुनर्वासन योजना के रूप में शुरू हुआ था। यह योजना दुनिया का पहला प्रयोग था। एक अप्रेल 1984 को आसाम के जंगलों से चार मादा और एक नर गैंडा (बांके) को लाकर दुधवा नेशनल पार्क की सोनारीपुर रेंज के बांकेताल में 33 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को सौर ऊर्जा चालित बाड़ से घेरकर बनाए गए विशेष घर में गैंडों को रखा गया था। इनमें से दो मादा गैंडों की एक साल के अंदर ही मौत हो गई। इससे पार्क प्रशासन निराश तो हुआ, लेकिन पुनर्वासन योजना को आगे बढ़ाने के लिए नेपाल से 16 हाथियों के बदले चार मादा गैंडे लाकर इस पुनर्वासन क्षेत्र में रखे गए। इसके बाद नर गैंडे बांके के संसर्ग से गैंडा परिवार में वृद्धि शुरू हुई। इस दौरान कई गैंडा शिशुओं का बाघ के हमले में, कुछ बीमारी के चलते काल के गाल में समा गए। बावजूद इसके गैंडों की संख्या में वृद्धि होती गई। इस बीच आनुवंशिक बदलाव के लिए नर गैंडा राजू आसाम के अलावा कानपुर चिड़ियाघर से लोहित नाम के एक नर गैंडे को लाया गया, लेकिन दबंग बांके ने उन्हें ठहरने नहीं दिया। आपसी संघर्ष में बांके ने राजू को इतना घायल कर दिया कि उसकी मौत हो गई। वहीं लोहित को घायल अवस्था में कानपुर चिड़ियाघर वापस भेज दिया गया।
दुधवा नेशनल पार्क की गैंडा पुनर्वासन योजना में गैंडा परिवार की संख्या इतनी बढ़ गई कि 33 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में बना गैंडों का घर छोटा पड़ने लगा। सबसे बड़ी दिक्कत यह थी कि 30 साल में जितने भी गैंडा शिशुओं का जन्म हुआ, उन सब में बांके का ही डीएनए था। बांके की संतानों के अलावा उसकी संतानों की संतानें हुईं। इस तरह आनुवंशिक दोष का संकट पैदा हो गया। इसे बचाने के लिए अप्रैल 2018 में गैंडा पुनर्वासन योजना फेज वन से तीन मादा गैंडा हिमांगनी, कल्पना और रोहिणी को बेलरायां रेंज के भादीताल स्थित फेज टू में शिफ्ट किया गया। उनके साथ नेपाली गैंडा नेपोलियन को रखा गया ताकि वंश वृद्धि हो सके। इसके सकारात्मक परिणाम आए और तीनों मादा गैंडों ने चार माह में एक-एक शिशु को जन्म दिया। दुर्भाग्यवश मार्च में हिमांगनी के शिशु की मौत हो गई। कल्पना और रोहिणी के शिशुओं की कड़ी निगरानी की जा रही है। गैंडा पुनर्वासन योजना के इतिहास में यह पहला मौका है जब रोहिणी और कल्पना के दोनों शिशु बांके के डीएनए से अलग हैं। यह दोनों नेपोलियन की संतान हैं।
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गैंडा पुनर्वासन योजना फेज टू में गैंडा शिशुओं के जन्म के साथ ही आनुवंशिक बदलाव की शुरुआत हुई है। इससे पहले गैंडा परिवार के सभी जीवित सदस्य बांके या बांके की संतान की संतान थे। इससे गैंडा परिवार में आनुवंशिक सुधार की संभावनाएं बढ़ीं हैं।
- संजय पाठक, मुख्य वन संरक्षक/फील्ड निदेशक, दुधवा टाइगर रिजर्व।

