मोदी और योगी के हौसले से सपा की राजनीतिक अपराधीकरण से लिया लोहा - शैलेन्द्र सिंह

𝐤𝐮𝐬𝐡𝐚𝐥 𝐕𝐞𝐫𝐦𝐚

- पूर्व डिप्टी एसपी ने मुकदमा वापस होने पर योगी सरकार का जताया आभार

दीपक वरुण

लखनऊ, 04 अप्रैल (हि.स.)। बाहुबली मुख्तार अंसारी पर आतंकवाद निरोधक अधिनियम (पोटा) लगाने वाले पूर्व डिप्टी एसपी (पुलिस उपाधीक्षक) शैलेन्द्र सिंह ने यह कह कर अपना इस्तीफा तत्कालीन सपा सरकर को सौंपा था कि राजनीति का अपराधीकरण काफी बढ़ गया है। जब यह लिखकर पूर्व की मुलायम सरकार को इस्तीफा सौंपा तो बौखलाहट में सरकार ने यह तक कह दिया कि सिर्फ चर्चित होने के लिए यह इस्तीफा दिया गया है। बाद में उन्होंने अपना दूसरा इस्तीफा सरकार को सौंपा। इस विषय पर 'हिन्दुस्थान समाचार' ने रविवार को पूर्व डिप्टी एसपी से खास बातचीत की।

पूर्व डिप्टी एसपी बताते है कि, ताकत लोकतंत्र में जनता देती है। अगर जनता ने इस बात का निर्णय ले ले कि हम अपराधी चरित्र के लोगों व माफियाओं को नहीं जितायेंगे तो जब यह नहीं जितेंगे तो कोई पार्टी इन्हें टिकट हीं नहीं देगी। सबसे बड़ी चीज लोकतंत्र में हम किसको दोष दें। मैंने बनारस में स्वतंत्र चुनाव लड़ा। समाजवादी पार्टी को छोड़कर सभी पार्टियां हमें टिकट दे रही थी। लेकिन मैंने स्वतंत्र चुनाव लड़ा और जनता से पूछा कि क्या आप एक शैलेंद्र को जीता जा सकते हैं। अगर एक शैलेंद्र को जीता देंगे तो पता नहीं कितने शैलेंद्र का अपने आप हौसला बढ़ जायेगा। तो मैने यह प्रश्न जनता के ​बीच में रखा कि हमें लोकतंत्र में ताकत आप दे रहे हैं। और आप दूसरे को मत कोसिए नेता बनते ही। अगर वो देख रहे है कि माफिया खड़ा करके हम जीत जा रहे हैं तो क्यों नहीं खड़ा करेंगें, यह गलती हमारी है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि जनता ही हमें लोकतंत्र में ताकत देती है और जनता ही इसे सुधार सकती है।

उल्लेखनीय है कि, बाहुबली मुख्तार अंसारी पर पोटा लगाने वाले पूर्व डिप्टी एसपी शैलेन्द्र सिंह को ​उम्मीद थी कि उन्हें न्याय मिलेगा। लेकिन कब मिलेगा यह वो नहीं जानते थे। आखिरकार वो दिन आया और इसी मार्च माह में शैलेंद्र सहित आठ लोगों पर वाराणसी के कैंट थाने में दर्ज मुकदमें को योगी सरकार ने वापस ले लिया। इस बात से शैलेन्द्र सिंह और उनका परिवार बेहद खुश है। लेकिन कही न कही यह गम भी है दिखा कि इन 17 सालों में उनके परिवार ने जो संघर्ष किया है वो शायद किसी ने किया होगा।

लाइट गन मशीन की रिकवरी को लेकर हुआ बवाल

शैलेंद्र सिंह बताते है कि, यह मामला सिर्फ एक करोड़ रुपये की लाइट गन मशीन को लेकर हुआ था। मैं सन 2004 में यूपी एसटीएफ की वाराणसी यूनिट का प्रभारी था। उस समय भाजपा नेता कृष्णानंद राय व मुख्तार अंसारी के बीच लखनऊ के कैंट इलाके में फायरिंग हुई थी। गैंगवार की आशंका के मद्देनजर एसटीएफ दोनों गुटों पर नजर रख रही थी। सभी के फोन को सर्विलांस पर लगाया जा चुका था। इस दौरान पता चला कि अपने गनर मुन्नर यादव के जरिए मुख्तार अंसारी सेना के भगोड़े जवान बाबू लाल यादव से लाइट गन मशीन खरीद रहा है। उसकी कीमत करीब एक करोड़ रुपये बताई गई।

बाबूलाल जम्मू कश्मीर की 35 राइफल्स से एलएमजी चुरा कर भागा था। हम लोगों ने शासन और वरिष्ठ अधिकारियों को अवगत कराते हुए इन दोनों को रंगे हाथ पकड़ने के लिए योजना बनायी। 25 जनवरी 2004 को वाराणसी के चौबेपुर इलाके में छापेमारी कर बाबू लाल यादव व मुन्नर यादव को गिरफ्तार कर लिया। उनके पास से तकरीबन दो सौ कारतूस के साथ एलएमजी बरामद की गई। एलएमजी के सौदे की बातचीत जिस मोबाइल फोन नम्बर से हो रही थी, वह मुख्तार के गुर्गे तनवीर के नाम पर था। वह जेल में था लेकिन फोन का इस्तेमाल मुख्तार कर रहा था। इसके बाद शैलेंद्र सिंह ने खुद चौबेपुर थाने में शस्त्र अधिनियम व पोटा के तहत मुख्तार अंसारी पर मुकदमा दर्ज कराया था।

सपा सरकार के दबाव में देना पड़ा इस्तीफा

उन्होंने बताया कि, मुख्तार अंसारी को बचाने के लिए तत्कालीन सपा सरकार ने मेरे ऊपर बहुत दबाव बनाया। कहा कि जब मैने लाइट गन मशीन की रिकवरी की थी तो सरकार से अनुमति लेकर यह कार्रवाई की थी। मुख्तार अंसारी यह सोचकर बच रहा था कि उस पर आर्म्स एक्ट की धारा लगी हैं लेकिन इसमें मैनें पोटा लगाया था। जब यह बातें सामने आई कि इसमें पोटा लगा हुआ है तो मुख्तार ने सरकार पर जो भी अपना दबाव बनाया हो यह बात हमसे कही जाने लगी की आप इस मुकदमें को वापस ले लें।

जब उन्होंने कहा कि साहब इस मामले की खबर मीडिया तक पहुंच गई और एफआईआर दर्ज हो चुकी है तो केस वापस लेना का कोई तुक नहीं बनता है। कहा गया कि इस मामले में किसी और अधिकारी को जांच सौंप देंगे लेकिन आप मुख्तार का नाम मत लीजिएगा। उन्होंने कहा कि साहब जब मैंने ही अपने वरिष्ठ अधिकारियों को बताकर खुद मुकदमा दर्ज करवाया है तो मैं मुख्तार का नाम कैसे न लूं।

इसके बाद उन्हें प्रताड़ित किया जाने लगा। रातों-रात कई उच्चाधिकारियों को तबादले कर मुझे लखनऊ बुला लिया गया। अधिकारियों ने कहा कि तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह तुमसे बहुत नाराज है। प्रताड़ना से आहत होकर मैंने फरवरी माह में पहला इस्तीफा सौंपा, जिसमें लिखा था कि राजनीति का अपराधीकरण काफी बढ़ गया है इसी वजह से मैं इस्तीफा दे रहा हूं। इसके बाद मुलायम सिंह कहने लगे कि यह इस्तीफा सिर्फ मीडिया में छाने के लिए दिया गया। इसके बाद मैने दूसरा इस्तीफ भेजा।

जाना पड़ा जेल

इस घटना के कुछ महीने बाद ही तत्कालीन सरकार के इशारे पर राजनीति से प्रेरित होकर मेरे ऊपर वाराणसी में अपराधिक मुकदमा लिखा गया और मुझे जेल में डाल दिया गया। आरोप था कि वाराणसी जिलाधिकारी कार्यालय के एक कर्मचारी ने कार्यालय के रेस्ट रूम में घुसकर तोड़फोड़ करने और मारपीट की है। इसके बाद मुझे जेल भेजा गया। इतना ही नहीं उनकी पूरी टीम को किसी न किसी तरह से प्रताड़ित किया जाने लगा।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने दिया था आश्वासन

पूर्व डिप्टी एसपी बताते है कि, जिस समय मुलायम सरकार ने उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज करावाया था। इसकी जानकारी होते ही वर्तमान में प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने फोन पर उनका हाल चाल लिया था। उस समय व गोरखपुर के सांसद थे। साथ ही यह भरोसा भी दिलाया था कि अगर प्रदेश में उनकी सरकार बनती है तो वो मुकदमें को वापस लेंगे। प्रदेश में जब भाजपा सरकार आई और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उक्त मुकदमे को प्राथमिकता के साथ वापस लेने का आदेश पारित किया, जिसे माननीय सीजेएम न्यायालय द्वारा छह मार्च, 2021 को स्वीकृति प्रदान की गई। मैं और मेरा परिवार मुख्यमंत्री योगी जी की इस सहृदयता का आजीवन ऋणी रहेगा।

वर्ष 2013 में हुई नरेन्द्र मोदी से मुलाकात

श्री ​सिंह बताते है कि योगी आदित्यनाथ के बाद अगर उनके परिवार का हालचाल लेने वाले दूसरे व्यक्ति है तो वो है देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी। वर्ष 2013 में उन्होंने गुजरात में एक पीआईएल डाली थी। बताया कि उस वक्त नरेन्द्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे और पीआईएल गर्वेंस पर बहुत काम हो रहा था। इसी दौरान उनकी मुलाकत नरेन्द्र मोदी जी से हुई थी। इस पर उन्होंने कहा था कि शैलेन्द्र तुम वन मैन आर्मी हो जो सरकार के विरुद्ध खड़ा हुआ है। आखिरकार तुम्हारे परिवार का घर खर्च कैसे चलता है। आपका परिवार कितनी समास्याएं उठाता है।

​दिल जानता है कि क्या-क्या परेशानियां उठाई

अपनी दास्तां बताते हुए शैलेंद्र सिंह भावुक हो उठे और कहा कि साहब जब किसी की नौकरी छीन जाती है तो परिवार चलाना बहुत मुश्किल हो जाता है। उनके पास तो खुद का मकान भी नहीं था। इन 17 वर्षों में हमने और मेरे परिवार ने जो परेशानियां उठाई है वो हमारा दिल ही जानता है। मेरे ऊपर जब मुकदमा दर्ज हुआ तो सरकार के दबाव में मुझे कोई मकान देने को राजी नहीं हुआ। एक मकान किसी तरह मिला तो अगले दिन उसे भी खाली करना पड़ा। इसके बाद एक मित्र के यहां अर्धनिर्मित मकान में जीवन ​व्य​तीत किया। पत्नी एक स्कूल में नौकरी करने लगी। मां और भाई भी काम करने लगा, तब कही जाकर परिवार संभला।

राज्यपाल को लिखा था पत्र

लगातार दबाव के कारण मैंने 11 फरवरी, 2004 को उत्तर प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल को पत्र लिखा था। जिसमें उन्होंने लिखा है कि 'मैं 1994 (वर्ष) की सीधी भर्ती सेवा का पुलिस उपाधीक्षक हूं तथा वर्तमान में पुलिस उपाधीक्षक एसटीएफ, लखनऊ के पद पर कार्यरत हूं। सारी परिस्थितियों से अवगत कराते हुए कहा कि अब मैं ईमानदारी एवं निष्ठापूर्वक अपने कर्तव्यों का पूरा करने में मैं अपने को असमर्थ पा रहा हूं। अत: मैं अपने पद से इस्तीफा दे रहा हूं। मेरा त्यागपत्र महानुभाव निवेदन पूर्वक स्वीकार्य करें। आगे लिखते हैं 'एक करबद्ध प्रार्थना और है कि, मेरे पास कोई निजी मकान नहीं है और न ही लाइसेंसी शस्त्र है, अत: मेरा मकान (सरकारी) व सुरक्षा व्यवस्था, अगली व्यवस्था होने तक पूर्ववत जारी रखने का आदेश सम्बन्धित को देने की कृपा करें।

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