Lakhimpur Kheri : बाघ को ट्रेंक्यूलाइज करने का सबसे लंबा चला अभियान

𝐤𝐮𝐬𝐡𝐚𝐥 𝐕𝐞𝐫𝐦𝐚
बांकेगंज। शायद यह पहला मामला है जब दुधवा टाइगर रिजर्व की किशनपुर सेंक्चुरी में एक बाघ को ट्रेंक्यूलाइज करने में 113 दिन का समय लगा है। यह अवधि अब तक की सबसे लंबी अवधि मानी जा रही है। इस अवधि में बाघ शिकारियों के फंदे को लेकर किशनपुर सेंक्चुरी के जंगल में घूमता रहा और ट्रेंक्यूलाइजर टीमों को चकमा देता रहा। दिसंबर की सर्दी से लेकर अप्रैल की चिलचिलाती धूप में भी ट्रेंक्यूलाइजर टीमें लगातार मोर्चे पर रहीं। तब जाकर कहीं बृहस्पतिवार को बाघ निशाने पर आ सका।

16 दिसंबर को किशनपुर सेंक्चुरी की कटैया बीट में दो शिकारी पकड़े गए थे, जिनके पास से शिकार के उपकरण भी बरामद हुए थे। अगले ही दिन दुधवा नेशनल पार्क के प्रभारी उप निदेशक डॉ. अनिल कुमार पटेल ने शिकार की आशंका के चलते जब जंगल में लगे कैमरों की तस्वीर खंगाली तो उसमें एक बाघ की ऐसी तस्वीर दिखाई दी जिसकी गर्दन में नायलॉन की रस्सी का फंदा पड़ा था।

दुधवा टाइगर रिजर्व के मुख्य वन संरक्षक संजय पाठक ने इसकी सूचना प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) को दी, जिस पर उन्होंने बाघ को ट्रेंक्यूलाइज कर उसकी गर्दन से फंदा निकालने के निर्देश दिए। तभी से ट्रेंक्यूलाइज टीमें लगातार इस बाघ को बेहोश करके पकड़ने का प्रयास कर रहीं थीं। जब उसकी सटीक लोकेशन पता चली तो उसकी घेराबंदी की गई, लेकिन जिस जगह पर बाघ मौजूद था, वहां ऊंची झाड़ियां, घास के मैदान और घना जंगल था, जिसके कारण ट्रेंक्यूलाइज टीमें बाघ को निशाने पर नहीं ले पा रही थीं। बाघ भी लगातार ट्रेंक्यूलाइज टीमों के साथ लुका-छिपी खेल रहा था, जिसके कारण बाघ को बेहोश करने में 113 दिन का समय लग गया। संवाद

इलाज के बाद जंगल में फिर छोड़ा गया बाघ
किशनुपर सेंक्चुरी के जंगल में बेहोश करने के बाद डॉ. दया के नेतृत्व में गठित टीम ने बाघ का स्वास्थ्य परीक्षण किया, जिसमें पाया गया कि नायलॉन रस्सी की रगड़ के चलते बाघ की गर्दन पर मामूली घाव हो गया था। गर्दन की रस्सी निकालने और घाव का उपचार करने के बाद बाघ को होश में लाने की दवा दी गई और फिर उसे वन विभाग के प्रोटोकॉल के तहत जंगल में छोड़ दिया गया।
मौके पर पहुंचे वन विभाग के आला अफसर
किशनुपुर सेंक्चुरी में बाघ के ट्रेंक्यूलाइज होने की सूचना मिलते ही दुधवा टाइगर रिजर्व के एफडी संजय पाठक, दुधवा नेशनल पार्क के उपनिदेशक मनोज सोनकर, दुधवा टाइगर रिजर्व बफरजोन उपनिदेशक डॉ. अनिल कुमार पटेल, वार्डेन तौफीक अहमद, रेंजर शत्रोहन लाल समेत कई अधिकारी मौके पर पहुंच गए और उपचार से लेकर बाघ को जंगल में छोड़े जाने तक वहीं मौजूद रहे।

 इसके अलावा इस अभियान में दुधवा की प्रशिक्षित हथिनी गंगाकली, चमेली, डायना समेत चारा कटर फील्ड कर्मी रामधन, तवरेज खां अजीत आदि डटे रहे। यह ऑपरेशन करीब तीन घंटे तक चला। रात करीब आठ बजे पिंजरे से मुक्त होकर बाघ ने आजादी की सांस ली।

किशनपुर सेंक्चुरी में बाघ को ट्रेंक्यूलाइज करने में पूरे 113 दिन का समय लगा। बाघ के उपचार, गर्दन में फंसी रस्सी निकालने और प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) की अनुमति के बाद बाघ को फिर जंगल में छोड़ दिया गया।
- संजय पाठक, मुख्य वन संरक्षक, दुधवा टाइगर रिजर्व

Post a Comment

0Comments

Post a Comment (0)

#buttons=(Accept !) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Check Now
Accept !